Wednesday, 30 December 2015

‘Say No’ to Facebook’s Free Basics



लोकतंत्र के बेसिक के ख़िलाफ़ है फ्री बेसिक

आजकल आप अपने अख़बार में फेसबुक का विज्ञापन देख रहे होंगे । एक ही बात को कहने के लिए फेसबुक हर दूसरे तीसरे दिन चार चार पन्ने का विज्ञापन दे रहा है । बाज़ार से लेकर हवाई अड्डे तक फेसबुक ने फ्री बेसिक के विज्ञापनों से भर दिये हैं । फेसबुक इन महँगे विज्ञापनों के ज़रिये अपने उत्पाद के लिए एक आंदोलन चला रहा है । आंदेलन का उसका तरीका जनलोकपाल और मिस्ड कॉल के ज़रिये दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनने का दावा करने वाली बीजेपी से मिलता जुलता है । फेसबुक अपने इस अभियान के ज़रिये भारत सरकार की संवैधानिक संस्था TRAI पर दबाव डाल रहा है । इसलिए चाहता है कि आप उसके दिए नंबर पर मिस्ड कॉल करें ।
फेसबुक को टेलीकॉम नियामक संस्था TRAI के एक फ़ैसले से आपत्ति है इसलिए कंपनी लाखों मिस्ड काल और ईमेल के ज़रिये जनदबाव की लहर पैदा करना चाहती है ताकि TRAI उसके मनोनुकूल फ़ैसला दे । मिशी चौधरी जैसी हस्तियाँ फेसबुक की फ्री बेसिक योजना को छलावा मानती हैं और अभियान चला रही हैं । फेसबुक इन नेट- कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ भी अभियान चला रहा है । आप भले न मिशी चौधरी के लेख को पढ़ पायें हों लेकिन उनकी दलील के ख़िलाफ़ फेसबुक का अभियान आप तक पहुँच गया है । ये है ताकत और संसाधन का खेल । केरल में एक कंपनी ने पंचायत पर ही कब्जा कर लिया । इसलिए फेसबुक के इस विज्ञापन युद्ध पर गंभीरता से विचार करना चाहिए ।
हमारे राजनीतिक दल सोते रहते हैं । इससे पहले एयरटेल ज़ीरो के प्लान को लेकर जब विरोध हुआ तब भी सो रहे थे । गनीमत है कि उस वक्त सरकार जल्दी जाग गई और मंत्री भी नेट न्यूट्रालिटी के हक में बयान देने लगे । सोशल मीडिया पर बने सीमित जनदबाव के आगे एयरटेल कंपनी ने अपनी योजना वापस ले ली । एयरटेल से आगे निकल फेसबुक कंपनी जनता के बीच चली गई है । वो अपने प्लान ‘फ्री बेसिक’ का विरोध कर रहे नेट- कार्यकर्ताओं और TRAI के खिलाफ जनसमर्थन जुटा रही है।
मुझे नहीं पता या फेसबुक ने अभी तक नहीं बताया कि कितनो मिस्ड कॉल आए हैं और उनकी सत्यता की जाँच कैसे की जा रही है । जो ईमेल भेजे जा रहे हैं उनकी सत्यता की जाँच करने का अधिकार और संसाधन TRAI के पास है या नहीं या TRAI जाँच करेगी भी या सिर्फ संख्या को राय मान लेगी । नियामक संस्था संख्या के आधार पर फ़ैसला करती है या अपनी नीतियों पर विचार करने के बाद फ़ैसला लेती है । क्या TRAI कोई लोकसभा है जिसका चुनाव फेसबुक अखबारों के मैदान में जाकर लड़ रही है ? क्या TRAI को फेसबुक को नोटिस नहीं भेजना चाहिए कि उसका ऐसा करना ही नेट न्यूट्रालिटी की सोच के ख़िलाफ़ हैं क्योंकि बाकी पक्ष के पास तो फेसबुक जितने अरबों रूपये नहीं है कि वो विज्ञापन देकर मिस्ड कॉल के कृत्रिम जनांदेलन में शामिल हो सके ।
क्या यह हमारे राजनीतिक दलों के लिए चिन्ता की बात नहीं ? क्या फेसबुक राजनीति का विकल्प पेश कर रहा है ? क्या यह कंपनियों की तरफ से यह राजनीतिक हस्तक्षेप का कोई नया रूप है ? मान लीजिये कि कोई भारतीय कंपनी नरेंद्र मोदी सरकार की किसी नीति के ख़िलाफ़ इस तरह से विज्ञापन युद्ध की घोषणा कर दे तो क्या सरकार चुपचाप सहन कर लेगी ? फिर फेसबुक जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को यह छूट क्यों मिल रही है ? क्या फेसबुक का यह क़दम TRAI की स्वायत्तता पर हमला नहीं है ? तो हमारी सरकार और हमारा विपक्ष चुप क्यों है ?  क्या इसलिए चुप हैं कि फेसबुक के मुख्यालय में जाकर हमारे नेताओं को नौजवान और फैशनेबुल होने का मौका मिलता है ? तो क्या TRAI को भी जवाबी विज्ञापन नहीं देना चाहिए कि उसके हिसाब से मामला क्या है ? जो सरकार इस बात पर नज़र रखती है कि कोई NGO विदेशी फंड से भारत में राजनीतिक गतिविधि न चलाए वो सरकार फेसबुक को राजनीतिक गतिविधि कैसे चलाने दे रही है ?
फ्री बेसिक क्या है ? फेसबुक कंपनी दावा करती है कि तीस देशों में लागू हैं । अमरीका या फ्रांस में है ? अमरीका में फ्री बेसिक क्यों नहीं है ? क्या वहाँ ग़रीब नहीं हैं ? थोड़ा बहुत पढ़कर लगा कि फ्री बेसिक ग़रीबी उन्मूलन का कोई कार्यक्रम है ! वैसे  चीन में तो फेसबुक नहीं है । पता नहीं वहाँ के ग़रीब क्या करते होंगे ।  फेसबुक के विज्ञापन में लिखा है कि ” एक अरब भारतीयों को नौकरी, शिक्षा, ऑनलाइन के अवसरों और बेहतर भविष्य से जोड़ने का पहला क़दम है । ” । सरकार का सारा लोड फेसबुक ले ले तो सरकार ही क्यों रहे ! विज्ञापनों पर फेसबुक ने इतना पैसा खर्च कर दिया लेकिन यही नहीं बताया कि फ्री बेसिक के तहत क्या सुविधा मिलेगी और कितने साल तक मिलेगी ।
भारत में करीब एक अरब लोगों के पास फोन है । क्या भारत सरकार यह मानती है कि जिसके पास फोन है वो ग़रीबी रेखा से नीचे है या ऊपर ? हमें नहीं मालूम । अगर ग़रीबी रेखा से ऊपर है तो फिर फेसबुक किसे ग़रीबी से बाहर लाएगा । क्या ग़रीबी सिर्फ सूचना की कमी के कारण है ? अगर सबको सूचना हो तो ग़रीबी नहीं रहेगी ? ये किस अर्थशास्त्री का फ़ार्मूला है ? क्या हमारी सरकारों ने इतनी तादाद में अवसरों का सृजन कर दिया है ? इस हिसाब से तो फेसबुक को यह दावा करना चाहिए कि उसके कितने यूज़र मिडिल क्लास से अपर क्लास में चले गए और उसमें फेसबुक का कितना योगदान रहा ? क्या फेसबुक सिर्फ ग़रीबों का क्लास ही बदलता है ! एकाध क़िस्सों से बदलाव की गाथा नहीं बनती ।
अमरीका में एक मोबाइल कंपनी है T-Mobile । इस कंपनी ने binge on नाम से एक सेवा शुरू की है । इसके तहत निश्चित डेटा प्लान के लिए कुछ वीडियों चैनलों को असीमित मात्रा में देखने की छूट होगी । इसमें यू ट्यूब नहीं है । यू ट्यूब ने आरोप लगाया है कि मोबाइल कंपनी ने अपनी सेवा में यू ट्यूब के वीडियो को कमज़ोर कर दिया है । मतलब आप T-Mobile के उपभोक्ता है और यू ट्यूब पर कोई वीडियो देखना चाहते हैं तो वह रूक रूक कर आएगा । उसकी गुणवत्ता ख़राब होगी । डेली हेरल्ड अख़बार ने लिखा है कि फेन कंपनी अपने इस प्लान को सभी थ्री जी उपभोक्ता को दे रही है । इस तरह से कंपनी ने बड़े उपभोक्ता वर्ग की पहुँच यू ट्यूब से दूर कर दी । जो लोग बिंज ऑन प्लान नहीं लेते हैं उनके फोन पर बाकी वीडियो चैनल की क्वालिटी खराब कर दी जाती है ।
न्यूज चैनलों की दुनिया में ये हो चुका है और हो रहा है । आप जानते हैं कि केबल में एक से सौ तक चैनल आते हैं । सौवें नंबर पर जो चैनल आएगा वो साफ नहीं आएगा या आप उतनी दूर तक सर्च नहीं करना चाहेंगे । इसलिए केबल वाले पहले दस में दिखाने के लिए चैनलों से अनाप शनाप पैसा लेने लगे और चैनल भी देने लगे । धीरे धीरे ये रेट इतना महँगा हो गया कि टीवी पत्रकारिता की तबाह हो गई । टीवी की सारी कमाई कैरेज फ़ीस देने में जाने लगी । इसके कारण धंधे में ब्लैक मेलिंग होने लगी और राजनीतिक दल भी घुस आए । जिसे जब मन करता है किसी चैनल को उड़ा देता है । केबल वाला मनमाने पैसे माँगता है ।
इस कारण खबरों के संकलन और पत्रकारों के भर्ती से लेकर पालन पोषण के खर्चे में कटौती होने लगी । पत्रकार समाप्त हो गए और खर्चे को कम करने के लिए दो चार एंकरों को स्टार बनाकर काम चलाया जाने लगा । ये जो आप बहस देखते हैं ये उसी का नतीजा है । इससे आपको क्या नुक़सान हुआ ? ये तब पता चलेगा जब आप किसी बात से प्रभावित होंगे और सरकार का ध्यान खींचने के लिए चैनलों के दफ्तर फोन करेंगे । कोई नहीं आएगा क्योंकि खबर की जगह तो पूरी शाम बहस चल रही होती है । निगम वाले रिश्वत न देने पर आपका मकान तोड़ जाएँगे और वाइस चांसलर अपनी मनमानी करता रहेगा । ख़बर होगी भी तो स्पीड न्यूज से ज्यादा नहीं होगी । शाम की प्राइम टाइम में आम लोग मारे जाते हैं ।
इसी तरह से मोबाइल कंपनियाँ रास्ता खोज रही हैं ताकि इंटरनेट की समतल भूमि पर तरह तरह की दीवारें बनाईं जा सकें और हर दीवार लाँघने की क़ीमत अदा करनी पड़े । सोचिये आप कोई ऐप बनाकर गूगल में डालते हैं । गूगल अपने सर्च ईंजन में आपके ऐप पर तरह तरह की बंदिशें लगा दे कि कोई खोज ही न सके और आप से दाम माँगे तो आप क्या करेंगे ? इससे तो टेलीकाम कंपनियाँ और कुछ बड़ी कंपनियाँ मिलकर बाक़ियों को बाहर कर देंगी। इससे तो नुक़सान हो जाएगा । इंटरनेट का इस्तमाल बिना रोक टोक होना चाहिए । कोई कंपनी यह तय न करे कि आप इतनी ही साइट देखेंगे। उस सूची में आने के लिए साइट या कंपनियों के बीच होड़ होगी । ऐसी होड़ केबल टीवी में होती है ।
इसीलिए यह लड़ाई लड़ी जा रही है कि नेट न्यूट्रालिटी होनी चाहिए । जैसे मैं इस लेख को लिखते समय मार्क जुकरबर्ग के लेख के लिए गूगल पर गया जो टाइम्स आफ इंडिया में आया है । कई बार उस लेख को खोला मगर दो पैराग्राफ़ से ज़्यादा नीचे की तरफ स्क्रोल नहीं हुआ । मैंने कई बार प्रयास किया लेकिन लेख नहीं पढ़ पाया जबकि उसी वक्त अपने मोबाइल पर कई लेख डाउनलोड कर स्क्रोल किया लेकिन कोई दिक्कत नहीं आई । क्या यह जानबूझ कर किया गया ? क्या फेसबुक भी ऐसा करता है ? क्या वो सारे लेखों को वैसी उदारता से साझा करने देता है कि सब देख सकें ? करता है या नहीं यह तो जानना ही चाहिए लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या हम जानते हैं ? वैसे काफी मशक़्क़त के बाद ज़करबर्ग का लेख स्क्रोल होने लगा ।
फ्री बेसिक को लेकर बहस में बराबरी होनी चाहिए । दोनों तरफ से सारी सूचनाएँ पब्लिक में आनी चाहिए । फेसबुक, विरोध करने वाले, ट्राई, नैसकॉम । सब अपनी बात पब्लिक में रखें । मान लीजिये फेसबुक कंपनी किसानों को मौसम समाचार बताने का ऐप देगी लेकिन मौसम की जानकारी तो सरकार के भारी निवेश से हासिल होती है । उपग्रह किसके पैसे से भेजे जाते हैं ? मौसम और तापमान बताने के ऐप तो हर फोन में मुफ़्त होने ही चाहिएं । यह तो वैसे ही मेरे फ़ोन पर है लेकिन फेसबुक कंपनी इसे फ्री बेसिक में शामिल कर हमें क्या देना चाहती है ? एक बात आप पाठक लोग ध्यान से समझ लीजिये । अस्पताल नहीं बनेंगे, डाक्टर नहीं होंगे तो ऐप बनाकर मरीज़ों की भीड़ कम नहीं हो जाएगी । किसी चीज़ की नौटंकी की भी हद होती है ।
फ्री बेसिक तो बड़ा सवाल है ही, उससे भी बड़ा सवाल है फेसबुक का तरीका । क्या यह लोकतंत्र और उसकी बनाई संस्थाओं के बेसिक के अनुकूल है ? आप कहेंगे कि क्या फ़र्क पड़ता है । जब तक मिलता है ले लो । तो आपने तय कर लिया है कि अब से किसी बात के लिए किसी पत्रकार को फोन नहीं करेंगे ? हमेशा डिबेट ही देखेंगे ? आपको मेरी शुभकामनाएँ ।
रवीश कुमार
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आपने महीनों से लगातार नेट न्यूट्रैलिटी की चर्चा सुनी होगी। हम आपको बताते हैं कि ये नेट न्यूट्रैलिटी क्या है। इंटरनेट की आजादी खतरे में है, फेसबुक का फ्री बेसिक्स नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ है। आप पूछेंगे कैसे और ये नेट न्यूट्रैलिटी होता क्या है।

नेट न्यूट्रैलिटी का मतलब है आपको मिलने वाली इंटरनेट सर्विस में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं। न किसी वेबसाइट के लिए अलग से कोई चार्ज न, न किसी वेबसाइट के लिए खास स्पीड। अगर आपके पास इंटरनेट कनेक्शन है तो आपको बिना किसी रुकावट के हर साइट देखने का पूरा हक है।

अब यहां पर फेसबुक का फ्री बेसिक्स चालाकी कर रहा है। वो कह रहा है कि मैं आपको इंटरनेट दूंगा और वो भी फ्री लेकिन आप सिर्फ फेसबुक और उसके साथ उसकी शर्तों पर जुड़ी कुछ चुनिंदा वेबसाइट ही देख पाएंगे। ये वैसा ही जैसा कि आपसे कहा जाए कि आपको रहने के लिए एक फ्री घर दिया जाएगा लेकिन आपको उसके बाहर जाने की आजादी नहीं होगी। क्या आप ऐसे घर में रहना पसंद करेंगे, नहीं ना तो फिर फ्री बेसिक्स को किसी भी तरह का समर्थन देने से पहले दो बार सोचें।

मूल सवाल है कि क्या फ्री का झांसा देकर, एक विदेशी कंपनी को हम भारत के डिजिटल क्रांति पर कब्जा कर लेने देंगे? क्या रोज अखबार में एड देकर, बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर मार्क जकरबर्ग जी उम्मीद कर रहे हैं कि भारत के लोग झांसे में आ जाएंगे। सीएनबीसी-आवाज ने लगातार इंटरनेट आजादी की लड़ाई लड़ी है और अब आखिरी मौका है नेट को बचाए रखने का।

नेट न्यूट्रैलिटी का मतलब है कि इंटरनेट सर्विस देने वाली कंपनी भेदभाव नहीं करेगी और किसी खास वेबसाइट के लिए अलग चार्ज नहीं करेगी। वाट्सएप या वाइबर से कॉल के लिए अलग से पैसे चार्ज नहीं किया जाएगा। किसी वेबसाइट के लिए रफ्तार को तेज या धीमा नहीं किया जाएगा। कोई खास कंटेंट ब्लॉक नहीं किया जा सकता है।

ट्राई के कंसल्टेशन पेपर की आखिरी तारीख 30 दिसंबर को थी और अब ये बढ़ा दी गई है। अब 7 जनवरी तक ट्राई को नेट न्यूट्रैलिटी पर सुझाव दे सकेंगे। लेकिन इसके पहले फेसबुक ने लाखों लोगों को झांसा देकर, अपने पक्ष में ट्राई को ईमेल भिजवा दिए है। बता दें कि फ्री बेसिक्स पर ट्राई को विरोध में 3 लाख और समर्थन में 55 लाख सुझाव मिले हैं।

फ्री बेसिक्स नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ है और फ्री बेसिक्स सिर्फ फेसबुक तक ही सीमित है। फ्री बेसिक्स के जरिए फेसबुक अपनी मोनोपॉली बनाने की कोशिश में है। लोगों में झांसे में लाकर फेसबुक ने फ्री बेसिक्स का समर्थन मांगने की मुहिम चलाई है। फेसबुक ने फेसबुक यूजर्स से भी समर्थन मांगा है। अखबारों में विज्ञापन के जरिए भी समर्थन जुटाने की कोशिश की गई है।

फ्री बेसिक्स फेसबुक का एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जिसमें आपको अपने फोन पर डेटा प्लान लिए बिना भी इंटरनेट की सुविधा मिलेगी। लेकिन इस फ्री के इंटरनेट में आपको सिर्फ फेसबुक और उसकी पार्टनर साइट्स ही देखने को मिलेगी। यानि आपके लिए इंटरनेट का मतलब है सिर्फ फेसबुक और ऐसी चुनिंदा साइट्स जिन्हें फेसबुक ने आपके लिए चुना है। ये बात सीधे सीधे नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ है या सरल शब्दों में फ्री का झांसा देकर इंटरनेट पर मौजूद हर साइट को देखने की आपकी आजादी को छीना जा रहा है।

कहने को फ्री बेसिक्स फेसबुक का फ्री फंडा है। जिसमें में बिना इंटरनेट के फेसबुक देने की बात कही जा रही है। फ्री बेसिक्स में फेसबुक के 100 पार्टनर हैं जिनकी साइटें फ्री में उपलब्ध होंगी। बता दें कि पहले फ्री बेसिक्स का नाम internet.org था। फेसबुक पर आरोप है कि फ्री बेसिक्स नेट न्यूट्रलिटी सिर्फ फेसबुक तक सीमित है। फ्री बेसिक्स के चलते लासक्स के जरिए एकाधिकार बनाने की कोशिश की जा रही है।

अखबारों में लगातार फ्री बेस्किस का विज्ञापन करने के साथ-साथ फेसबुक के चेयरमैन मार्क जकरबर्ग ने एक अंग्रेजी अखबार में बड़ा सा लेख लिखा है। लेख में जकरबर्ग ने फ्री बेसिक्स का बचाव करते हुए कई दलीलें दी हैं। जकरबर्ग ने सवाल भी उठाए हैं कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि भारत में फ्री बेसिक्स का इतना विरोध क्यों हो रहा है।

मार्क जकरबर्ग के मुताबिक कुछ सेवाएं सबके लिए फ्री होनी चाहिए और फ्री बेसिक्स में शिक्षा, सेहत समेत सब कुछ है। भारत में लोगों को इंटरनेट से जोड़ने की जरूरत है और फ्री बेसिक्स उनके लिए है जो खर्चा नहीं कर सकते हैं। मार्क जकरबर्ग ने अपने तर्क में कहा है कि फ्री बेसिक्स को 30 से ज्यादा देशों में समर्थन मिला है और इससे 1.5 करोड़ लोगों को फायदा हुआ है। फ्री बेसिक्स से जुड़ने वाले 30 दिन में फुल इंटरनेट पर शिफ्ट हुए हैं।

मार्क जकरबर्ग का कहना है कि फ्री बेसिक्स के खिलाफ कुछ लोग गलत प्रचार कर रहे हैं और ये कहना गलत है कि फ्री बेसिक्स से इंटरनेट की आजादी छीनेगी। फ्री बेसिक्स का मतलब सिर्फ फ्री फेसबुक नहीं है। फ्री बेसिक्स के लिए कोई भी टेलीकॉम कंपनी संपर्क कर सकती है और कोई भी डेवलपर इसके साथ जुड़ सकता है। फ्री बेसिक्स के लिए किसी डेवलपर्स से पैस नहीं लिए जाते हैं। साथ ही फ्री बेसिक्स के लिए किसी टेलीकॉम कंपनी को पैसे नहीं दिए जाते हैं।

फेसबुक का दावा है कि 86 फीसदी लोग फ्री बेसिक्स के समर्थन में हैं। यही नहीं 91 फीसदी ग्रैजुएट लोग फ्री बेसिक्स को सही मानते हैं। फेसबुक ने 3000 लोगों का सर्व करवाया था। लेकिन आईआईटी और अन्य टेक संस्थान के अलावा माइक्रोसॉफ्ट, ट्रूकॉलर, पेटीएम, जोमैटो, माउथशट डॉट कॉम, आईस्पिरिट, पिनस्ट्रॉम और मीडियानामा जैसी दिग्गज कंपनियां फ्री बेसिक्स का विरोध कर रही हैं।

नेट न्यूट्रैलिटी इंटरनेट पर मौजूद हर वेबसाइट देखने की आजादी है जिसमें हर वेबसाइट के लिए एक जैसी स्पीड की आजादी मिलती है। आपको बता दें कि नेट न्यूट्रैलिटी को लेकर कई विवाद हुए हैं। विरोध के बाद एयरटेल ने एयरटेल जीरो बंद किया था। एयरटेल जीरो में फ्लिपकार्ट को फ्री दिया गया था। इसी तरह नेट न्यूट्रलिटी को लेकर फेसबुक के internet.org का भारी विरोध हुआ था।

इंटरनेट की आजादी खतरे में है और इसे आप ही बचा सकते हैं। हमारे साथ जुड़िए इंटरनेट बचाओ आंदोलन में। अगर आप अब भी नहीं जागे तो आपके इंटरनेट की आजादी खतरे में पड़ना तय है। फेसबुक ने अपने फ्री बेसिक्स को बचाने के लिए अखबारों में विज्ञापनों की झड़ी लगा दी है, वो आपसे अपने लिए समर्थन मांग रहा है। मिस कॉल करने के लिए कह रहा है और बहुत से लोग कर भी रहे हैं लेकिन ये जाने बिना की ऐसा करके वो अपना कितना बड़ा नुकसान कर रह हैं। हम आपको इस खतरे से आगाह कर रहे हैं, मत करिए बिना सोच समझे मिस कॉल क्योंकि अब तक फेसबुक लाखों लोगों को अपने झांसे में फंसा चुका है।

इस बीच सूत्रों का कहना है कि ट्राई ने फ्री बेसिक्स का कमर्शियल लॉन्च अप्रैल 2016 तक टालने को कहा है। ट्राई ने फ्री बेसिक्स के विज्ञापन भी बंद करने को कहा है। ट्राई ने फेसबुक और रिलायंस कम्युनिकेशंस को फ्री बेसिक्स के विज्ञापन हटाने के लिए 10 जनवरी तक का वक्त दिया है।

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फ्री बेसिक्स के नाम पर फेसबुक का दूसरा 'धोखा'


फ्री बेसिक्स के नाम पर फेसबुक का दूसरा 'धोखा'
फेसबुक पर आरोप है की वह गलत तरीके से यूजर से अपने विवादास्पद फ्री बेसिक्सपर समर्थन ले रहा है.

पिछले कई दिनों से फेसबुक यूज कर रहें कई लोगों के अकाउंट में फ्री बेसिक्स से जुड़े नोटीफिकेशन आ रहें हैं. इसके अनुसार आपके कई मित्रों ने एक पिटीसन पर अपनी रजामंदी दिखाई है.

फेसबुक बहुत ही चालाकी से आपको भी उस पिटीसन पर हामी भरने के लिए प्रेरित कर रहा है. यह कोई आप पिटीसन नहीं है बल्कि आपके फ्री इंटरनेट यूज करने के अधिकार को छीन लेने की तैयारी है.

आप जैसे ही इस नोटीफिकेशन पर क्लिक करेंगे, या आपको दूसरे पेज पर ले जाएगा जहां पर पहले से ही एक मैसेज लिखा हुआ है. आप उस पेज पर जैसे ही सेंड का बटन क्लिक करेंगे, आपकी तरफ से टेलीफोन रेगुलेटरी अथोरिटी ऑफ इंडिया यानी ट्राई को एक संदेश भेज दिया जाएगा. इस मैसेज में आप भारत में इंटरनेट डॉट ऑआरजी को समर्थन एवं नेट न्यूट्रेलिटी के विपक्ष में एक संदेश ट्राई को भेज चुके होंगे.

क्या है फेसबुक का फ्री बेसिक्स

भारत में फेसबुक ने इंटरनेट डॉट ऑआरजी सबसे पहले रिलायंस कम्युनिकेशन के साथ लॉन्च किया था. विवाद के बाद रिलायंस को पीछे हटना पड़ा था. बाद में फेसबुक ने इस सर्विस का नाम बदलकर फ्री बेसिक्स रख दिया. 
इसके तहत फेसबुक पूरे भारत में हर किसी को फ्री इंटरनेट देगा. इसके तहत हर यूजर को कुछ वेबसाइटों को कुछ साइटों का एक्सेस फ्री कर दिया जाएगा. 

इंटरनेट डॉट ऑआरजी- विवाद का विषय

फ्री के साथ-साथ कुछ चीजे चौकाने वाली भी है. फ्री वेबसाइटों के अलावा प्रत्येक चीज के लिए आपको कीमत चुकानी होगी. यानी यूट्यूब से लेकर ट्विटर तक, जीमेल से लेकर गूगल सर्च तक-- हर चीज की कीमत. यही नहीं, हो सकता है की युट्यूब पर तेज इंटरनेट के लिए ज्यादा कीमत और कम कीमत के लिए कम कीमत. 
असलियत में यह आजादी के मौलिक अधिकार का हनन है. 

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क्या है इंटरनेट न्यूट्रीलिटी और क्यों हो रहा है इसका विरोध!

यह है इंटरनेट न्यूट्रीलिटी
फेसबुक ने एक प्रोग्राम शुरू किया है जिसे नाम दिया गया है – इंटरनेट न्यूट्रीलिटी (Internet Neutrality)। यह प्रोग्राम इंटरनेट.ओअारजी (internet.org) के तहत शुरू किया गया है। इसका मकसद है कि फेसबुक हर फोन पर फ्री हो जाए। ऐसा हो जाए तो अच्छा ही है नाइसमें बुरा क्या हैआइए जानते हैं इसका मकसद और बुरे परिणाम
यह है मुहिम
इंटरनेट.ओअारजी (internet.org) के तहत फेसबुक लोगों से इस अभियान का समर्थन करने को कह रहा है कि सबके मोबाइल फोन पर इंटरनेट फ्री होना चाहिएलेकिन उसमें सिर्फ कुछ ही वेबसाइट चल पाएं जिनमें फेसबुक जरूर हो।
विस्तार से समझिए – यह है साजिश
यदि मोबाइल कंपनियां हर यूजर को इंटरनेट फ्री देंगी तो उन्हें इस बात की आजादी मिल जाएगी कि वे तय कर पाएं कि कौन सा यूजर कौन सी वेबसाइट देख रहा है। मतलब यदि कंपनी चाहेगी कि आप गूगल की जगह सिर्फ याहू या रेडिफ का इस्तेमाल करें तो वह आपके फोन पर गूगल खुलने ही नहीं देगी। मतलब आप सिर्फ वही वेबसाइट देख पाएंगे जो वह कंपनी चाहेगी।
इसका मुझे क्या नुकसान?
इसका सबसे अधिक नुकसान आपको ही है। जब कंपनी को ये तय करने की आजादी मिल जाएगी कि आप क्या देखेंगे और कितना देखेंगे तो आपके फोन का इंटरनेट उस कंपनी का गुलाम हो जाएगा। आप वह नहीं देख पाएंगे जो आप देखना चाहते हैंबल्कि सिर्फ वह देख पाएंगे जो वह कंपनी दिखाना चाहती है। आसान उदाहरण से ऐसे समझिए – मान लीजिए आप ऑनलाइन शॉपिंग के जरिए एक मोबाइल फोन खरीदना चाहते हैं। एक कंपनी उसकी कीमत दस हजार बता रही है जबकि दूसरी कंपनी उसी को नौ हजार में बेच रही है। ऐसे में यदि आपकी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (आपकी मोबाइल सेवा कंपनीआपको सिर्फ दस हजार में फोन बेचने वाली कंपनी ही दिखाना चाहेगी तो वही फोन नौ हजार में बेचने वाली कंपनी को बैन कर देगी। मतलब आपको उस सामान को महंगा ही खरीदना पड़ेगा क्योंकि कम दाम का तो आपको पता ही नहीं लगेगा।
कंपनी को क्या फायदा?
मोबाइल कंपनियां फेसबुक की इस साजिश यानी (internet.org) का समर्थन इसलिए कर रही हैं ताकि उन्हें इंटरनेट को गुलाम करने का मौका मिल जाए। इसके बाद वे कंपनियों से पैसे लेकर उनकी वेबसाइट दिखाना शुरू कर देंगी। जो वेबसाइट पैसा नहीं देगीउसे बैन कर देगी वह कंपनी।
भारत में हुआ था जोरदार विरोध
जैसे ही भारत में फेसबुक की यह साजिश शुरू हुईसबसे पहले रिलायंस ने और उसके बाद एयरटेल ने इसका समर्थन करना शुरू किया। जैसे ही एयरटेल ने समर्थन कियाहर तरफ से विरोध होने लगा। चूंकि एयरटेल के उपभोक्ता भी ज्यादा हैंइसलिए विरोध तेजी से फैला और आखिर में कंपनी को इस साजिश से किनारा करने की घोषणा करनी पड़ी।
तो अब आ गई ना समझ में कि यह कितनी बड़ी साजिश है। इसलिए इंटरनेट न्यूट्रीलिटी के नाम पर इंटरनेट को गुलाम करने की साजिश में आप शामिल होना चाहते हैं या नहींये निर्णय सोच समझकर ही लीजिएगा।


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नेट न्यूट्रिलिटी:- यह भी नेट का ही एक भाग है। यह यूजर से एप्स और अन्य सेवाओं के लिए पैसे लेने का मामला है, जबकि दुनिया के अन्य देशों में इसके लिए कानून बन चुका है। नेट सेवाओं की तुलना केबल टीवी से नहीं हो सकती है। नेट न्यूट्रिलिटी शब्द चर्चा में है एयरटेल की वजह से। क्योंकि इस टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर कंपनी एयरटेल ने वीओआईपी के लिए अलग से चार्ज लगाने की घोषणा की है, जो ग्राहकों के मौजूदा डेटा पैक का हिस्सा नहीं होगा। यानी डेटा पैक से आप केवल इंटरनेट सर्फ कर सकते हैं लेकिन व्हाट्ाएप, लाइन, फेसबुक जैसे मैसेंजर या विशेष वेबसाइटों के लिए आपको अलग से शुल्क देना होगा। क्या है यह:- इंटरनेट अपने खुलेपन के लिए जाना जाता है। यह लोगों को एक दूसरे से जानकारियों के आदान प्रदान के लिए जोड़ता है। नेट न्यूट्रिलिटी की उपज टेलीफोन लाइन्स है। 20वीं सदी के आरंभ से इस पर काम हो रहा है। जहां तक टेलीफोन लाइन की बात है तो आप किसे भी फोन लगा सकती है। उसमें इस बात से कंपनी को कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप किस कंपनी की सेवा इस्तेमाल कर रहे हैं। किसे फोन लगा रहे हैं। न ही कोई खास नंबर को तब तक रोकती है जब तक उसमें कानून आदेश या बिल न भरा हो। अधिकांश देशों में यह नियम है कि टेलीकॉम ऑपरेटर यानी कंपनी को अनफिल्टर्ड (बिना जाने कि कौन फोन कर रहा है) और अबाधित फोन सेवा देनी होती है। जब दुनिया में 1980 में इंटरनेट की शुरुआत हुई और 1990 में यह पूरी दुनिया में फेल गया तो ऐसे कोई नियम नहीं थे, जो इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों (आईएसपी) से कहें कि वे भी इनका पालन करें, लेकिन अधिकांश टेलीकॉम कंपनियां ही इंटरनेट सेवा देने वाली बनीं। इसलिए वे इस नियम में काम करती रहीं। इसी नियम को नेट न्यूट्रिलिटी कहा जाता है। यानी इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी उसके सर्वर पर आने वाले ट्रैफिक को नियंत्रण में नहीं रख सकती। जब कोई वेब यूजर किसी वेबसाइट या वेब सेवा से कनेक्ट होता है तो यूजर का हर जगह एक जैसी स्पीड मिलती है। जो डेटा रेट-ट्यूब के वीडियों के लिए रहता है, वही फेसबुक के फोटो के लिए भी रहना चाहिए। यूजर किसी भी वैध वेबसाइट या वेब सेवा तक पहुंच सकता है। इसमें किसी भी इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी का हस्तक्षेप नहीं रहेगा। कुछ देशों में नेट न्यूट्रिलिटी के नियम हैं और कुछ में नहीं। इसके बाद भी इस नियम का पालन किया जाता है। यह कानून के रूप में तो नहीं नियम के रूप में प्रचलित है। कोई भी वेब यूजर किसी भी वैध वेबसाइट से जुड़ सकता है। इसमें इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी को इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि उसके सर्वर से कैसा कंटेट या सामग्री आ या जा रही है। इसी कारण इंटरनेट पूरी दुनिया में फेल चुका है। यह लोगों की अभिव्यक्ति का सरल माध्यम बना है। उदाहरण के लिए आप अपने ब्लॉग में आपको इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी की जमकर खिंचाई भी कर सकते हैं, लेकिन उक्त कंपनी आपको उक्त पोस्ट करने से नहीं रोक सकती। लेकिन इससे भी ज्यादा अहम पक्ष है इंटरनेट के क्षेत्र में समान धरातल पर काम करने की बात। किसी वेबसाइट को शुरू करने के लिए आपको ज्यादा पैसे या कनेक्शन की जरूरत नहीं होती है। बस अपनी वेबसाइट को होस्ट कीजिए, यदि आपकी सर्विस अच्छी होगी तो वेबयूजर बढ़ते चले जाएंगे। इसमें केबल टीवी जैसा नहीं रहता है कि आपको केबल कनेक्शन देने वाले से पहले जुड़ना होगा ताकि आपके टीवी में चैनल आ सकें। इंटरनेट सेवा में इस तरह से आपको कंपनी से बात नहीं करनी होती है। इसी कारण से गूगल, फेसबुक, ट्िवटर फेलते चले गए। करोड़ाेे यूजर ये केवल नेट न्यूट्रिलिटी के कारण ही फेले हैं। उन्होंने तमाम वेब यूजर को तमाम वेबसाइट एक्सेस करने की छूट दी। 
देश:- दुनिया में चिली ऐसा पहला देश है, जहां पर नेट न्यूट्रिलिटी को 2010 में लागू किया गया। 2014 में चिली टेलीकम्यूनिकेशंस के नियामक सबटेल ने मोबाइल ऑपरेटरों को जीरों रेटिंग करने से प्रतिबंधित कर दिया। ऐसे में इंटरनेट कंपनियों ने मोबाइल टेलीकॉम ऑपरेटरों के साथ मिलकर कंज्यूमर को फ्री इंटरनेट यूज करने का करार किया। इसी प्रकार से यूरोप में द नीदरलैंड्स में 2011 में पहली बार नेट न्यूट्रिलिटी का कानून पारित किया गया। बाद में यूरोपियन यूनियन ने इसी कानून को अपनाकर कानून पारित किया। मकसद केवल इतना था कि पूरे यूरोपियन यूनियन में एक समान टेलीकम्युनिकेंशस कानून हो। यहां तक कि इंटरनेट कंपलियों और मोबाइल आम्परेटरों के बीच जीरो रेटिंग करार पर भी नए कानून पर प्रतिबंध लगा दिया। ब्राजील में 2014 में पारित ’इंटरनेट लॉ’ में इसे और पैना किया गया। इसमें साफ कहा गया कि नेट न्यूट्रिलिटी का अर्थ है सभी डेटा ट्रांसमिशन को नेटवर्क ऑपरेटर समान मानेंगे। उसके कंटेट या कहा से आया है, सेवा या ऐप्लीकेशन के आधार पर भी भेद नहीं किया जाएगा। यहां तक कि इंटरनेट सेवा प्रदाता एटी एंड टी, वेरीजोन और कॉमसेट किसी भी वैध कंटेट को रोकेंगे नहीं। न ही ये कंपनियां किसी एप्लीकेशन या सेवा की स्पीड कम कर सकती हैं। साथ ही सेवा देने के एवज में पैसा भी नहीं वसुलेंगी। देश में वॉट्स एप सबसे बड़ा मैसेजिंग एप बन चुका है। इसी कारण से कई कंपनियों को घाटा लग चुका है।

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